भारत-नेपाल के मध्य संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - (प्रागैतिहासिक काल से मल्ल राजवंश तक)

by Dr. Dushyant Kumar Shah


भारत-नेपाल के मध्य संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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India-Nepal History- IJR


भारत के साथ नेपाल के ऐतिहासिक सम्बन्धों की सजीव परम्परा प्रागैतिहासिक काल से ही प्रारम्भ होती है। भारत का नेपाल से ऐतिहासिक ही नहीं प्रागैतिहासिक सम्बन्ध भी रहा है। यद्यपि दोनों देशों के प्राचीनतम सम्बन्ध प्राचीन काल में त्रेता युग और द्वापर युग में पुराणों के साक्ष्य द्वारा प्राप्त होते है। तथापि दोनों देशों के मध्य सम्बन्धों की सजीव परम्परा बौद्ध धर्म के प्रवेश के पश्चात्‌ होता है | नेपाल का ऐतिहासिक ज्ञान मुख्यतः भोजपत्र, मुद्रा, बौद्ध ग्रन्थ आदि साक्ष्यों के द्वारा मिलते है।


अभिलेखिक साक्ष्यों के अन्तर्गत मानदेव का छंगुनारायण स्तम्भ शिलालेख, जिष्णुगुप्त का थानकोट शिलालेख", इत्यादि लिच्छविकालीन महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्यों के द्वारा नेपाल की शासन परम्परा की प्राचीनता स्पष्ट होती है, इससे सम्बन्धित सामग्रियों साहित्यिक ग्रंथों में सम्मिलित है, जिनके अन्तर्गत पुराण, तंत्र, ज्योतिष तथा वंशावलियां आदि आते है। इनके अतिरिक्त अनेक विषयों के ग्रंथों में अथर्व परिशिष्ट, स्कन्दपुराण, देवी पुराण, गरुड पुराण, बृहन्नलतंत्र, वराहतन्त्र आदि का नाम उल्लेखनीय है। नेपाल से प्राप्त वंशावलियों में भी भारत-नेपाल सम्बन्धों की पौराणिक, ऐतिहासिक धार्मिक, भौगोलिक एवं प्रशासनिक आदि विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। स्वयंभू पुराण एवं स्कन्द पुराण के नेपाल महात्म्य और लोकश्रुतियों से यह ज्ञात होता है कि भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ स्वयं नेपाल गये थे। तत्कालीन कालखण्ड में सातवे किरातजातीय शासक जितेदास्ती का राज्य था, जो बुद्ध के उपदेशों को सुनकर बौद्ध हो गये थे। भारत का प्रसिद्ध मगध साम्राज्य नेपाल के किरातयुग का समकालीन था। इन पारस्परिक सम्बन्धों की स्पष्टता भारतीय साहित्य, पुराभिलेखिक साक्ष्य एवं नेपाल के वंशावलियों से होती है।


ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत प्राचीन नेपाल के इतिहास का उद्गम स्रोत अनुश्रुतियाँ मात्र है। जनता में प्रचलित कथानकों को आधार-शिला मान कर उस पर नेपाल के इतिहास की जो अट्टालिका इतिहासकारों ने प्रस्तुत की है, उसके अनुसार पूर्व काल मे सम्भवतः ऐतिहासिक युग के आरम्भ के अचिर पूर्व गोपाल राज्य अथवा वंश का उदय हुआ, गोपाल, नेपाल देश के संस्थापक व्यक्ति विशेष का नाम था| डा.आर.सी. मजूमदार ने अपनी पुस्तक 'एन्शिएण्ट इण्डिया के पृष्ठ 373 में अंकित किया है कि सर्वप्रथम गोपाल की आठ पीढ़ियों ने प्राचीन काल में नेपाल पर शासन किया पर गोपाल का अर्थ गोपालक जाति aविशेष से लेना उचित नहीं लगता। गोपाल को व्यक्तिवाचक संज्ञा समझना अधिक युक्ति-युक्त होता है। गोपाल वंश के शासनकाल की घटनाओं का उल्लेख हमें इतिहास नहीं देता है। वह तमसावृत है, केवल इतना पता है कि गोपाल वंश के आठवें शासक क्षितिपाल के शासन काल में आभीरों ने नेपाल पर आक्रमण किया, जिसमें आक्रामक दल की विजय हुई, और गोपाल कुल के शासन का नेपाल में अन्त हो गया।


गोपाल वंश के बाद नेपाल में जिस नये राजवंश का उदय हुआ, उसका नाम था अहीर वंश।| इस वंश के जयमति सिंह और भूवनसिंह नामक दो राजाओं का नाम मिलता है।॥ ईस्वी सन्‌ के आरम्म काल के आभीरों तथा अहीरों ने भारत में प्रवेश कर पश्चिमी भारत के राजनीतिक इतिहास में चिरस्मरणीय उथल-पुथल एवं क्रांति उत्पन्न कर दी थी। सम्भवतः उसी वीर जाति की पूर्ववर्ती किसी एक शाखा ने गोपाल वंश के अन्तिमनेपाल-नरेश को पराभूत कर नेपाल के सिंहासन को अधिकृत किया तथा नेपाल में आभीर राजकुल की नींव डाली थी। इस कुल के केवल दो राजाओं ने राज्य किया। आभीर भूपतियों के शासन एवं कार्य का ज्ञान इतिहास नहीं देता है। आभीर राजवंश के अन्तिम भूपति राजा भूवनसिंह के शासन काल में किरातों का आक्रमण नेपाल पर हुआ, जिसमें आभीर राजवंश का रण में पराभव हुआ, और नेपाल के राज्य सिंहासन पर विजेता किरातों का आधिपत्य हो गया |

आभीरवंश के पश्चात्‌ नेपाल के जिस प्राचीन राजवंश का पता चलता है वह किरात वंश | भारतीय प्राचीन साहित्य-वेद-पुराण तथा ग्रंथों में भी वनवासी किरात जाति का नाम अनेक स्थलों में आया है। सम्भवतः हिमालय एवं गंगा के बीच पार्वत्य वन प्रदेशों में रहने वाली तिब्बती-वर्मी जाति का नाम किरात है ।





लिच्छवि राजवंश :-


किरातों और निमिष राजकुल के उपरान्त नेपाल में लिच्छवियों” ने प्रथम शती ई0पू0 के उत्तरार्थ से लेकर कम से कम 8वीं शती ई0 तक शासन किया। नेपाल में एक श्रद्धेय, राजनीतिक शक्ति के रूप में उदित होने के पूर्व भारत में चमक चुके थे। नेपाल के लिच्छवियों को मानदेव के छांगुनारायण स्तम्भ अभिलेख" तथा द्वितीय जयदेव की पशुपतिनाथ प्रशस्ति अभिलेख में मनु, इक्ष्वाकु आदि सूर्यवंशी राजाओं का वंशज तथा हवेनसांग की भारत-ञयात्रा के विवरण में क्षत्रिय कहा गया है। लिच्छवियों की उत्पत्ति की समस्या के समाधान में उनके सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण का अध्ययन बहुत सहायक हो सकती है। इस प्रसंग में सबसे पहले स्मिथ के इस सुझाव की चर्चा की जा सकती है कि लिच्छवियों का तिब्बती जनों से घनिष्ठ सम्पर्क था |" वी0 सी0 लाहा, के0पी0 जायसवाल, एच0 सी०0 राय चौधरी आदि भारतीय विद्वानों ने लिच्छवियों को वैदिक क्षत्रियों की सन्‍्तान माना है|! उनका कहना है कि प्राचीन भारतीय साहित्य लिच्छवियों को एकमत से क्षत्रिय बताता है। महापरिनिब्वान सुत्त में कहा गया है कि भगवान बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने पर उनके भस्मावशेषों का एक अंश लिच्छवियों ने यह तर्क देते हुए मांगा था कि भगवान बुद्ध क्षत्रिय थे और वे भी क्षत्रिय खुद्दकपाठ पर बुद्धघोष द्वारा लिखित परमत्थजोतिका' नामक टीका में भी लिच्छवियों की उत्पत्ति बनारस की एक रानीके गर्भ से हुआ बताया गया है। बौद्ध धर्म के साहित्यिक स्रोतों के अलावा जैन ग्रन्थों में भी अनेक लिच्छवि जनों को क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत बताया गया है। उदाहरणार्थ कल्पसूत्र नामक जैन ग्रन्थ में वैशाली के लिच्छवि सरदार चेटक की बहन को क्षत्राणी कहा गया है ॥


लिच्छवियों के ऐतिहासिकता के बारे में विद्वानों का मत है कि भूमिवर्मन लिच्छवि-वंश का प्रथम नरेश था, जिसने नेपाल में लिच्छवि राजवंश की नींव डाली। पर यह भी सत्य है कि भूमिवर्मन निमिषकुल के अन्तिम राजा भास्करवर्मन का दकत्तक पुत्र था। शास्त्रानुसार किसी भी स्वजातीय कुल के बालक गोद लेने पर उस बालक का वही गोत्र हो जाता है जो उसके गोद लेने वाले पिता का होता है। ई0पू० छठी शताब्दी में वर्तमान बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर जिले में प्राचीन लिच्छवियों का प्रमुख गणराज्य वैशाली में था। सम्प्रति बनिया बसाढ़ गाँव उक्त प्राचीन वैशाली का स्थानापनन है। उस वैशाली राज्य की सीमा पर गंगा नदी के पार मगध में प्रबल राजतंत्र था, जहाँ हर्यक कुल का साम्राज्यवादी राजतान्त्रिक शासक बिम्बसार पुत्र अजातशत्रु राज्य करता था। ई0 पू0 5वीं शताब्दी के आरम्भ में अजातशत्रु ने वैशाली की विजय वहाँ के गण संघ के प्रमुख राजा चेतक, जो अजातशत्रु का मातामह भी था, को परास्त किया था। वैशाली-विजय के पूर्व अजातशत्रु ने लिच्छवियों की अजेय शक्ति से आशंकित एवं भयभीत होकर उनमें फूट डालने के विचार से अपने कूटनीतिज्ञ मंत्री वस्साकार ब्राहमण को कूटनीतिक चाल से प्रतारित कर छद॒म वेश में वैशाली भेजा। पीछे अपनी भेदनीति की सफलता का समाचार उस मंत्री के विश्वासी अनुचर द्वारा प्राप्त कर उसने लिच्छवियों पर आक्रमण किया, और उनका विनाश किया। युद्ध में भयंकर युद्ध में अधिकांश लिच्छवि राजाओं एवं उनके अनुयायी सैनिकों ने वीरगति प्राप्ति की। जो बचे उनमें से सभी ने अपने शेष दल के साथ वैशाली का परित्याग किया और नेपाल में जा कर निवास स्थान बनाया।


ई0पू0 पाँचवी शती में अजातशत्रु के साथ रण में लिच्छवियों के पराभव के पश्चात्‌ से लेकर द्वितीय शताब्दी ईसाब्द तक का लिच्छवियों का इतिहास अंधकार में पड़ा है। लगभग छः: सौ वर्षों से भी अधिक अवधि के पश्चात्‌ हम उस कुल को लोकतांत्रिक नहीं, राजतांत्रिक शासक के रूप में शासन करते हुए नेपाल में पाते है। डॉ0 आरसी. मजुमदार के अनुसार लिच्छवियों के नेपाल के सिंहासन पर आसीन होने के उपलक्ष्य में एक नये सम्वत्‌ का प्रारम्भ किया गया |



कुषाण सम्राट और नेपाल के लिच्छवि :-


प्रथम शती ई0पू० से लेकर गुप्तकाल के प्रारम्भ तक लिच्छवियों का इतिहास अत्यन्त तिमिराछन्न है। इसी बीच उत्तर भारत में कुषाण साम्राज्य की स्थापना हुई थी। नेपाल इस राज्य में सम्मिलित था या नहीं बता पाना मुश्किल है। डी0 आर0 रेग्मी का कथन है कि प्रथम और द्वितीय कुषाण शासक कडफिसस के कुछ सिक्‍के नेपाल की उपत्यका में मिले है। इसलिए यह सर्वथा सम्भव है कि इन दो कुषाण सम्राटों ने नेपाल को अपने नियंत्रण में किया हुआ था। और नेपाल से कुषाण सिकक्‍कों की प्राप्ति से अर्थ लगाया जा सकता है कि भारत और नेपाल से उस काल में व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित रहे होगें |


गुप्त साम्राज्य और नेपाल के लिच्छवि :-


कुषाणों के उपरान्त भारत में दूसरा महत्वपूर्ण साम्राज्य गुप्तों ने स्थापित किया। रेग्मी ने केपी. जायसवाल की इस भ्रान्त धारणा का अनुसरण करते हुए कि दक्षिणापथ का वाकाटक नरेश प्रथम प्रवरसेन, लगभग अखिल भारत का सम्राट था, यह माना है कि वाकाटकों ने नेपाल उपत्यका को, कम से कम सांस्कृतिक दृष्टि से अपने प्रभाव के अन्तर्गत सम्बन्ध स्थापित किया था। नेपाल के इतिहास का अधिक गहरा संबंध गुप्तों के अभ्युत्थान से है, क्योंकि नेपाल न केवल राजनीतिक दृष्टि से उनके साम्राज्य का एक अंग बन गया था वरन्‌ उसकी प्रशासकीय-व्यवस्था, धर्म, भाषा, लिपि तथा सामाजिक संगठन पर इस साम्राज्य की गहरी छाप पड़ी थी। गुप्त साम्राज्य का संस्थापक प्रथम चन्द्रगुप्त था। उसका विवाह लिच्छवि कुमारी कुमारदेवी से हुआ था, इसका ज्ञान हमें समुद्रगुप्त के प्रयाग-प्रशस्ति से होता है, जिसमें उसे 'लिच्छविदौहित्र' कहा गया है। इतना ही नहीं गुप्त राजाओं ने इस ऐतिहासिक विवाह के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त कुमारदेवी प्रकार के सिक्के भी चलाये थे, जिनके पूरोभाग पर चन्द्रगुप्त और कुमारदेवी के नाम तथा पृष्ठभाग पर 'लिच्छवय: लेख मिलते है। डी0 आर० रेग्मी का विचार है कि चन्द्रगुप्त की महादेवी कुमारदेवी नेपाल के लिच्छवि राजपरिवार में उत्पन्न हुई थी |


चन्द्रगुप्त के पुत्र समुद्रगुप्त ने नेपाल को अपने प्रभाव के अन्तर्गत निश्चित रूपेण किया था। उसकी प्रयाग-प्रशस्ति लेख में जिसकी रचना समुद्रगुप्त के सब्धिविग्रहीक, कुमारामात्य, महादण्डनायक हरिषेण ने की थी- नेपाल का परिगणन उन प्रत्यन्त राज्यों के अन्तर्गत किया गया है, जिन्होंने समुद्रगुप्त को सर्वकरदान आज्ञाकरण प्रणामागमन से परितुष्ट किया था| नेपाल के लिच्छवि राजा, गुप्त शासकों के प्रभुत्व कब तक मानते रहे, यह तो अज्ञात है, लेकिन ये तथ्य कि नेपाली अभिलेखों में गुप्त अभिलेखों के समान ही संस्कृत साहित्य और हिन्दू सम्प्रदायों का ही नहीं वरन्‌ गुप्त शासन-व्यवस्था और गुप्त अभिलेखों में प्रयुक्त शब्दावली का भी गहरा प्रभाव मिलता है। और नेपाल देश का उत्कर्ष और प्रसार विशेषतः गुप्त साम्राज्य के हास-काल में हुआ इस बात के संकेत माने जा सकते है कि चौथी पॉँचवी शताब्दी ई0 में नेपाल के राजा या तो गुप्तों के अधीन बने रहे अथवा उनसे नियंत्रित एवं प्रभावित थे।



वैश्य ठाकुरी कुल :-


सातवीं शताब्दी ई0 के प्रारम्भ में नेपाल में राजनीतिक अव्यवस्था फैली जिसका लाभ उठाकर अंशुवर्मन नामक सामन्‍्त ने सत्ता हथिया ली। अंशुवर्मन, जो अन्तिम लिच्छवि शासक शिवदेव प्रथम का सामन्‍्त था| तथा इसने नेपाल में वैश्य ठाकुरी राजवंश की स्थापना की | अंशुवर्मन द्वारा राज्याधिकार हस्तगत कर लेने के पश्चात कैलासकूट को अपनी राजधानी बनायी | उपरोक्त वैश्य ठाकुरी राजवंश, क्षत्रिय वर्ण का एक उपविभाग है। के0 पी0 जायसवाल के अनुसार महासामन्त अंशुवर्मन ने अपनी मृत्यु के पूर्व तक नेपाल का महाराजाघिराज बना हुआ था। अतः उनके मतानुसार नेपाल पर तिब्बत का प्रमुत्व अंशुवर्म के शासनकाल में कभी नहीं हो सका था।* मंजुश्री इतिहास भी इस तथ्य का समर्थन करता है कि जिष्णुगुप्त के बाद नेपाल पर विदेशी सत्ता का अस्थायी प्रभाव पड़ा। अंशुवर्मन के युवराज उदयदेव को राज्यच्युत कर उसके अनुज मानदेव द्विततीय ने स्वयं राजसिंडासन पर अधिकार कर लिया उदयदेव के पुत्र नरेन्‍्द्रदेव ने तिब्बत नरेश की सहायता से अपना पैतृक सिंहासन प्राप्त कर लिया। राज्य तो उसने इस प्रकार प्राप्त कर लिया पर विदेशी सहायता का मूल्य उसे तिब्बत की प्रभुसत्ता स्वीकार कर चुकाना पड़ा। अब से नरेन्द्रदेव तिब्बत का अधीन राजा हो गया। डॉ0 आर0 सी0 मजुमदार के मतानुसार लिच्छवि राजा शिवदेव के राज्य आपहर्ता वैश्य ठाकुरी वंशजात विश्वासघाती एवं राजद्रोही महासामन्त अंशुवर्मन के मृत्युपरान्त राज्य में क्रान्ति मची और 643 ई0 में शौर्यशील नरेन्द्रदेव ने पुनः नेपाल के सिंहासन पर लिच्छवि-कुल को प्रतिष्ठित किया तथा स्वयं वहाँ का राजा बना। नरेन्द्रदेव के पुत्र शिवदेव द्वितीय का विवाह मगध-सम्राट आदित्यसेन की पोती के साथ हुआ था। शिवदेव द्वितीय के पुत्र जयदेव का विवाह मह्ठाभारत प्रसिद्ध वीर भगदत्त के वंशज 'कामरूप नरेश हर्ष की कन्या के साथ हुआ था। हर्ष को गौड़, औड, कलिंग, कोशल तथा अन्यान्य प्रदेश का विजेता एवं राजा बताया गया। उपर्युक्त वैवाहिक सम्बन्धों से पता चलता है कि नेपाल नरेशों की प्रतिष्ठा एवं यश उस काल में चतुर्दिक फैल रही थी और पड़ोस के सभी भू-सम्मान्य पतिगण उनके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने में गौरव का अनुभव करते थे। इस प्रकार पड़ोस के प्रायः सभी पराक्रमी राजकुल के नृपतियों के साथ कारण उन सभी नेपाल के लिच्छवी कुल, भूषों का वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बीच सौहार्द्र की स्थापना हुई, जिससे नेपाल देश की शक्ति बढ़ गई। उसका यश चारों तरफ फैल गया, शत्रु भयभीत हुए और मित्रों की वृद्धि हुई तथा सभी नेपाल के हित-चिन्तक एवं सहायक बन गये।


डॉ0 आर0 सी0 मजुमदार के अनुसार जयदेव की मृत्यु के लगभग 150 वर्षों पीछे तक तिब्बत की प्रभुसत्ता नेपाल पर बनी रही। 838 ई0 में कोई धर्म नामक राजा तिब्बत के सिंडासन पर बैठा। वह क्रूर प्रकृति का निरंकुश एवं अत्याचारी राजा था। उसके अनाचार, अत्याचार एवं पाशविक व्यवहार के कारण प्रजा में क्षोम उत्पन्न हुआ, और साम्राज्य में भीषण क्रान्ति हुई नेपाल ने विषम परिस्थिति से लाभ उठाकर तिब्बत की परतन्त्रता जुए को अपने कन्धों से उतार फेंका। मजुमदार के मान्यतानुसार विदेशी आधिपत्य से नेपाल को मुक्त कर लेने के उपलक्ष्य में उस पावन कार्य के स्मारक के रूप में नृपति ने एक सम्वत्‌ का प्रवर्तन 879 ई0 में किया, जिसका नाम नेपाल सम्वत्‌' पड़ा। उस काल से नेपाल के केवल राजनीतिक इतिहास में ही नहीं, उसके आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी एक नये युग का आरम्भ हुआ राज्य में सभी ओर उनन्‍नतिशील नगरों का निर्माण हुआ। नेपाल की वर्तमान राजधानी काठमाण्डू की भी स्थापना या तो उस काल में हुई अथवा उसका समुचित विकास हुआ, तथा उसके महत्व की सम्यक वृद्धि हुई । लिच्छवि कुल के लगभग 28 राजाओं ने नेपाल पर शासन किया, अत: उनका शासनकाल चार से पाँच सौ वर्षों तक बना रहा |


कर्णाट क्षत्रिय राजवंश :-


ग्यारहवी शताब्दी के आरम्भ के लगभग नेपाल के अधीन माण्डलिक सामन्त नृपतियों की शक्ति बहुत बढ़ गयी थी। देश के भिन्‍न-भिन्‍न भागों में दो अथवा तीन भूपतियों का शासन पृथक होना आरम्भ हो गया था। उनकी राजधानियाँ क्रमश: काठमाण्डू, पाटन और भादगाँव में थी | 11वीं शत्ती के अवसान के लगभग 1098 ई0 में तिरहदुत के कर्णाट वंशीय राजा नान्यदेव ने नेपाल की विजय की, इस विजेता ने सारे नेपाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तथा वहाँ की तीनो राजधानियों से सम्पूर्ण विजित देश पर अपने मृत्युअब्द 1147 ई0 तक निष्कण्टक राज्य करता रहा। डॉ0 आर0 सी0 मजुमदार की मान्यता के अनुसार तिरहुत में कर्णाट-क्षत्रिय राजकुल के संस्थापक राजा नान्यदेव ने 1098 ई0 में नेपाल की विजय की और 1118 ई0 तक वहाँ का सम्राट बन कर शासन किया। डॉ0 आरए0 रेग्मी के ग्रन्थ 'एंशियन्ट एण्ड मेडाइवल नेपाल के अनुसार नान्यदेव का नेपाल पर शासन-काल सुखपूर्वक व्यतीत न हो सका। नान्यदेव सम्पूर्ण नेपाल-तराई पर पूर्ण रूपेण आधिपत्य स्थापित कर लेने में सक्षम और सफल नहीं हुआ था। उसे 1441 ई0 में पुनः नेपाल की विषय करने की आवश्यकता पड़ी थी। इससे पता चलता है कि 1098 ई0 में नेपाल विजय करने के पश्चात्‌ तथा 1441 ई0 के पूर्व वह अधिकार से निकल गया था। रेग्मी महाशय की मान्यता के अनुसार नान्यदेव के पश्चात्‌ उसके उत्तराधिकारियों का आधिपत्य नेपाल के सिंहासन पर नहीं रह सका। नान्यदेव की मृत्यु के उपरान्त ठाकुरी कुल के राजकुमारों ने पुनः अपना राज्य स्थापित कर लिया, और काठमाण्डू के सिंहासन पर बैठकर पूरे नेपाल पर शासन आरम्भ कर दिया। यह सम्भव हो सकता है कि नान्यदेव की मृत्यु (1147 ई0) के पश्चात्‌ स्थानीय सरदारों ने अपनी अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी हो पर यह भी सत्य है कि वे सब नान्यदेव के उत्तराधिकारियों की प्रभुसत्ता को किसी न किसी अंश तक नान्यदेव की मृत्यु के पीछे भी स्वीकार अवश्य कर रहे थे। नान्यदेव के द्वारा नेपाल-विजय के पूर्व नेपाल की राजनीतिक स्थिति डाँवाडोल हो गयी थी। बंगाल के पतनोन्मुख पाल वंश के शासकों के देश के कुछ अंश पर शासन का पता नेपाल में चलता है। ताड़पत्र पर लिखित 'कुविजामातम्‌' नामक ग्रंथ की एक प्रति के अन्त में अंकित मिला है कि वह नेपाल के बौद्ध सम्राट रामपाल के शासनकाल में लिखा गया था | विक्रमादित्य पष्ठ दक्षिणी चालुक्य राजा के पुत्र सोमेश्वर तृतीय के उत्कीर्ण शिलालेख से भी स्पष्ट होता है कि उस कुल का प्रभुत्व नेपाल पर भी हो गया था। पट्टकडल उत्कीर्ण अभिलेख बताता है कि उस काल में नेपाल चालुक्य राज सोमेश्वर तृतीय के करद सामन्त राज्यों में से एक था। और 1200 ई0 के भित्तिलेख से भी ज्ञात होता है कि दक्षिणात्य कलचूरि राजा विज्जल ने दक्षिणी विजेता चालुक्य-नृपति सोमेश्वर के वंशज तैलप तृतीय को पराजित कर उसके अधीन एवं संरक्षित राज्य नेपाल को छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया था। सन्‌ 1191 और 1210 ई0 के बीच उत्कीर्ण मनगली अभिलेख से पता चलता है कि दक्षिण के यादव राजा जैतुगी ने नेपाल सेना को पराजित किया था। उपर्युक्त प्रशस्तियों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि नेपाल पर पूर्व में दक्षिणात्यों का भी कुछ काल के लिए आधिपत्य हो गया था । आज भी नेपाल के विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ महादेव मन्दिर के पुजारी दक्षिण भारतीय दक्षिणी विजेताओं ब्राइमण के वंशधर नियुक्त किये जाते है। इससे यह प्रमाणित होता है कि का आधिपत्य नेपाल पर पूर्व में अवश्य था।


नान्यदेव भी मूलतः: दक्षिण भारत का निवासी था और वह्ट चालुक्यों की कर्णाट शाखा में उत्पन्न हुआ था। वह सूर्यवंशी था, सम्भवतः उसके पूर्वज सोमेश्वर अथवा विक्रमादित्य पष्ठ के आक्रमण काल में ही उत्तर भारत में आगमन हुआ था, और सुविधानुसार विजित प्रदेश में बस गये थे। नान्यदेव के आदि-विरूद 'महासामान्ताधिपति' से स्पष्ट होता है कि वह आरम्भ में किसी सम्राट का सामन्‍्त था और उसकी ओर से शासन करता था। सम्भव है कि नान्यदेव के चालुक्य राज भी सामन्त रहे हो।


ग्याहरवीं शताब्दी के अन्त में नेपाल की राजनीतिक स्थिति ने नान्यदेव को नेपाल पर आधिपत्य स्थापित करने में सहायता दी थी। तिरहुत के सिंहासन पर उसका अधिकार 1097 ई0 में ही हो चुका था। नेपाल देश की सीमा तिरहुत की सीमा से टकराती थी। ठाकुरी राजवंश के नयकोटा शाखा के शिवदेव ने नेपाल-सिंहासन का अपने को अधिकारी बताना आरम्भ किया। उस शाखा को पाटन की शाखा ने 1080 ई0 और 1088 ई0 के बीच नेपाल से निकाल कर बाहर कर दिया था। गृहकलह् ने नेपाल साम्राज्य की नसें ढीली कर दी थी तथा चारों ओर अराजकता फैल गयी। शिवदेव ने नान्यदेव से सहायता की याचना की। नान्यदेव ने उस परिस्थिति का लाभ उठाया। उसने शिवदेव का पक्ष ग्रहण किया तथा तराई में इससे उसका प्रभाव हो गया। नेपाली अनुश्रुतियों के अनुसार उसने अपनी राजधानी सीमाओं से ही काठमाण्डू एवं पाटन के स्थानीय नेपाली शासक जयदेव मल्ल तथा भादगाव के आनन्दमल्ल को सिंहासन से हटाकर सम्पूर्ण नेपाल पर अधिकार कर लिया था।


नान्यदेव की मृत्यु सन्‌ 1147 में हुई। नेपाल के उन राजवंशों के राजाओं, जिन्हें नान्यदेव ने राज्यच्युत तो कर दिया था, पर उनका विनाश नहीं किया, उसके जीवन काल में भी उसके करद माण्डलिक राजा बनकर अपने-अपने शासन-द्षेत्र में शासन करने लग गये थे। उन माण्डलिक सामन्तों से कर्णाट कुल के सम्राट को वार्षिक राजकर प्राप्त होता था। नान्यदेव की मृत्यु के पश्चात्‌ उसके कुल के तिरहुत के भूपतियों की नाम मात्र की प्रभुसत्ता नेपाल के माण्डलिक राजाओं पर लगभग दो सदियों तक बनी हुई थी। लिच्छवियों के शासन के अन्तिम चरण में शासन-सूत्र के ढीला होने पर माण्डलिकों एवं सरदारों ने स्थान-स्थान पर स्वतंत्र होकर राष्ट्र की अखण्डता को नष्ट कर दिया था। देश में मत्स्य न्याय का बोलबाला हुआ। शक्तिशाली मल्ल कुल के क्षत्रियों ने अब नेपाल के सिंहासन पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।


मल्ल राजवंश :-


बारहवीं शताब्दी के अन्त में नेपाल में मल्‍ल नामान्त शासकों का उदय हुआ। इनमें 'जयसिंद मल्‍्ल एवं अरिमल्ल प्रमुख थे। यहाँ एच0 सी0 रे का मत अधिक समीचीन जान पड़ता है जो कहते हैं कि वैशाली के अपने प्राचीन संघ के साथ प्राचीन मल्लों का नेपाल में पुनरोदय तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है। भारतीय साम्राज्यवादी से बचने के लिए मल्लों ने पर्वतों की शरण ली और हिमालय की पहाड़ियों के मध्य अपना सुरक्षित क्षेत्र बनाया। जहाँ लिच्छवियों को नेपाल की घाटी के मध्यवर्ती भाग में जमने का अवसर मिला-वहीं दूसरी तरफ मल्‍ल गण्डक के पश्चिम चले गये। किन्तु ये दोनों गणजातियाँ अच्छे पड़ोसी के रूप में नहीं रह सकी और इनमें परस्पर सीमा-संघर्ष में लिच्छवियों का पपलड़ा हमेशा भारी रहा।


डेनियल रॉइट की बौद्ध वंशावली में पाटन के दक्षिण में सन्‌ 991 ई0 में दो मल्‍ल कुमारों द्वारा चम्पापुरी की स्थापना का उल्लेख प्राप्त होता है। इसी समय धर्मपाल नामक 'एक शासक के शासन करने (998 ई0) का उल्लेख भी एक पाण्डुलिपि में है। उक्त वंशावली में नेपाल के इन मल्लों के साथ कर्णाट राजा नान्यदेव की झड़प का उल्लेख प्राप्त होता है। सम्राट अशोक के निगलिट्वा स्तम्भलेख में भी किसी तपुमल्‍ल का उल्लेख है। इन संदर्भो के आधार पर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि नवीं शताब्दी ई0 से ग्यारहवी शताब्दी ई0 के मध्य घाटी में अनेकश: व्याप्त अराजकता एवं वाहूय आक्रमणों ने मल्‍्ल प्रमुखों का शक्ति संचय का अवसर प्रदान किया | फलत: अरिमल्लदेव ने कुछ समय उपरान्त (1197 ई0 के कुछ पूर्व) घाटी में शाही सत्ता स्थापित कर ली। इन मल्ल प्रमुखों ने साम्राज्य प्राप्ति सूचक उपाधियाँ भी धारण की किन्तु उनकी सत्ता दीर्घकाल तक स्थिर नहीं रह सकी। मल्‍ल जय पराजय, सत्ताच्युति एवं प्राप्ति के झूले में अनेक बार झूलते रहे। बाद में हुए अभयमल्ल के शासनकाल में अकाल और भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदायें भी आयी। उसके पुत्रों - जयदेव मल्‍ल और आनन्दमल्ल ने काठमाण्डु पाटन, भादगाँव में शासन किया और अनेक नगरों को बसाया। इसके बाद भी अनेक मल्‍ल शासक हुए। अनन्तमल्ल के शासनकाल ने पर्वतीय जनजातियों ने नेपाल पर बारम्बार हमला किया और आगजनी, नरसंहार, विध्वंस से घाटी में तबाही मचायी। इन बर्बर आदिवासी आक्रान्त जनजातियों के क्षेत्र पल्पा में भी मल्‍लों का एक मजबूत गढ़ था।


1328 ई0 में जब नेपाल में आदित्यमलल का शासन था, खसों ने उस पर आक्रमण किया। उसके बाद का इतिहास बहुत स्पष्ट नहीं है। इसी बीच किसी समय मल्लकुमारी सतीनायक देवी ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया। उसके शासन के बाद मल्लों के राज्य में गृहयुद्ध की लपटें उठने लगी। उसके समय में सामंती विद्रोह एवं अव्यवस्था का अन्त हुआ और सुशासन एवं शान्ति के युग का सूत्रपात हुआ। उसने 43 वर्षो तक शासन किया। उसके समय चीन के राजाओं ने नेपाल के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापत करने का प्रयास किया। ऐतिहासिक दृष्टि के आधार पर यदि विचार किया जाय तो यद् विदित होता है कि दोनों देशों की पुरातन बातें जैसे रीति-रिवाज, आहार-व्यवष्टार-धार्मिक मान्यताएं आदि एक समान है। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों के अतिरिक्त भारत के जन प्रकृति के साथ नेपाल का जो घनिष्ठ भाषा-साम्य, स्वरूप स्वभाव की एकता तथा रक्त सम्बन्ध है। उसे न तो भौगोलिक सीमा रेखाओं से अलग किया जा सकता है और न ही राजनीतिक प्रयासों से दबाया जा सकता है।


हिमालय की अविजित शैल-शिखरों के समान इस सनातन सच्चाई की तरफ हजारों लोकजन की इस उद्घोषणा को दबाया नहीं जा सकता की नेपाल और भारत दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध अटूट है।


अत: उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत और नेपाल की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धाराएं परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध है जिसका प्रमुख कारण उनकी भौगोलिक स्थिति है। यद्यपि भारत एवं नेपाल के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध सहज प्राकृतिक रूप से प्रारम्भ से ही था। इसका कारण प्रधान रूप से गंगा नदी की उपत्यका थी, जो नेपाल के समीप स्थित थी। नेपाल के बागमती नदी मार्ग से नेपालवासी भारतीय परिक्षेत्र में आसानी से प्रवेश कर जाते थे। सम्भवत: इसी मार्ग से ही उत्तर एवं दक्षिण भारत के साम्राज्य निर्माताओं का प्रभाव नेपाल की घाटी तक पहुँचा।





About the Author


Dr. Dushyant Kumar Shah has been awarded a Ph.D. from the Department of Ancient Indian History, Culture & Archaeology, Banaras Hindu University, Varanasi. His research focuses on the Inscriptional Study of India-Nepal Relations. He is currently an Assistant Professor in the Dept. of History, Kirori Mal College, University of Delhi.




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