मोदी सिद्धांत : भारतीय विदेश नीति के बदलते आयाम

लेखक : डॉ . अभिषेक श्रीवास्तव

Image Credits: Indian Express


हाल ही में नरेन्द्र मोदी की सरकार ने केंद्र में अपने सात साल पूरे किये हैं| इस दौरान नई दिल्ली ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अधिक सक्रियता दिखाई है| अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय राजनयिक दृष्टिकोण में कई अहम् बदलाव किये| भारत की विदेश नीति अब गुटनिरपेक्षता की नीति से आगे बढ़कर अन्तराष्ट्रीय मामलों में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रही है| अन्तरराष्ट्रीय आतंकवाद के मुद्दे से लेकर जलवायु परिवर्तन के विषय तक तथा भारतीय योग से लेकर मानवता की रक्षा के लिए कोविड के वैक्सीन पर लगे बौद्धिक संपदा अधिकार को समाप्त करने के मुद्दे तक विगत कुछ वर्षों में भारत ने अपना पक्ष तथा सुझाव वैश्विक मंचों पर मुखरता से रखा है|


प्रधानमंत्री मोदी के विदेश नीति को चार आयामों में समझना चाहिए –

1. भारत को पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों से बचाना|

2. वैश्विक स्तर पर एक ऐसा वातावरण तैयार करना जो भारत के आर्थिक विकास के लिए अनुकूल हो विदेशी निवेश भारत आये|

3. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज सुनी जाए और भारत आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, निरस्त्रीकरण तथा वैश्विक संस्थानों के सुधारों जैसे मुद्दों पर अपने सुझाओं से विश्व को प्रभावित करने में सक्षम हो|

4. विश्व के विभिन्न देशों में रह रहे अपने प्रवासियों की हित की रक्षा करना तथा उनको देश से जोड़े रखने के लिए लगातार प्रयास करना|


भारत ने ‘नेबरहुड-फर्स्ट नीति’ के तहत अपने पडोसी देशों के साथ संबंधों को बेहतर करने के कई कूटनीतिक प्रयास किये, परन्तु अपने कुछ पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध हमेशा समस्याग्रस्त रहे हैं। भारत चीन और पाकिस्तान को इस क्षेत्र में अपनी सुरक्षा चुनौतियों के रूप में देखता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में पाक-चीन की जुगलबंदी तथा चीन के विस्तारवाद ने भारतीय कूटनीति के सामने कई नए प्रश्न खड़े किये हैं| अक्टूबर 2019 में प्रधानमंत्री मोदी ने ममल्लापुरम में एक द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की, बैठक को भारत-चीन संबंधों में मील का पत्थर बताया गया; परन्तु चीनी नेतृत्व की विस्तारवादी नीति के कारण यह ठोस परिणाम देने में विफल रहा तथा 2020 में लद्दाख क्षेत्र में सैन्य संघर्ष ने संबंधों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया|


यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी अधिक सक्रिय एवं मुखर रहते हैं| चीन को गलवान और लद्दाख क्षेत्र में भारतीय सेना द्वारा प्रतिकार करना या कश्मीर में भारतीय सैनिकों पर घातक हमले के जवाब में पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ भारत “सर्जिकल स्ट्राइक” तथा 2019 में पुलवामा हमले के बाद “बालाकोट एयर स्ट्राइक” करना, भारत ने प्रत्येक घुसपैठ की कोशिश का अनुकूल जवाब दिया है| भारत ने अपने रक्षा क्षेत्र में काफी ढांचागत बदलाव भी किये हैं, स्वदेशी हथियारों के निर्माण हो या सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क एवं पुल निर्माण, फ़्रांस से राफेल एवं रूस से S-400 का आयत करना हो भारत सरकार ने सभी मामलों में काफी सक्रियता दिखायी|


प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की “लुक ईस्ट” नीति को अधिक सक्रिय और समयानुकूल करते हुए “एक्ट ईस्ट” नीति में बदला, जिसका उद्देश्य बेहतर बुनियादी ढांचे, व्यापार और क्षेत्रीय संस्थानों के माध्यम से भारत को पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्व एशिया (आसियान) के देशों से जोड़ना है। भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” आर्थिक संबंधों के साथ-साथ सुरक्षा हितों को भी समान महत्व देती है। भारत हिन्द महासागर के इस क्षेत्र में मुक्त समुद्री नेविगेशन और विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर में समुद्री सुरक्षा के लिए एक नियम-आधारित व्यवस्था की बात करता रहा है|

उर्जा, व्यापार एवं भू-राजनैतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में भी नई दिल्ली ने अपने संबंधों को गति देने का कार्य किया है| पश्चिम एशिया में भारत ने अपनी पूरवर्ती नीति को जारी रखते हुए एक बड़ा बदलाव भी किया, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इजराइल के साथ द्विपक्षीय सम्बन्ध विकसित करना वैश्विक कूटनीतिक गलियारे को एक बड़ा सन्देश था| हालाँकि ईरान के साथ भारत के संबंधों में नई चुनौती देखने को मिल रही है जिसे आने वाले वर्षों में नई दिल्ली को परस्पर विस्वास और सहमति के आधार पर सुलझाना होगा|


प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्ववर्तियों के पूर्वाग्रह को दरकिनार करते हुए पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका के साथ भारत के संबंधों को विस्तृत किया तथा रूस के साथ 2+2 मंत्री स्तरीय वार्ता की शुरुवात भी की, जिसमे दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री हिस्सा लेंगे| यूरोप के साथ अपने संबंधों को भी नए आयाम देने की शुरुवात की गई है| हाल ही में संपन्न हुए भारत- यूरोपीय संघ शिखर वार्ता में भारत और यूरोपीय संघ ने संतुलित, महत्वाकांक्षी एवं समग्र कारोबार समझौते और ‘स्टैंड-अलोन’ निवेश संरक्षण समझौता पर बातचीत शुरू करने पर सहमति जताई। पहली बार भारतीय प्रधानमंत्री ने यूरोपीय संघ +27 के प्रारूप में नेताओं के साथ बैठक की। भारत-यूरोपीय संघ के बीच आठ साल बाद एफटीए पर बातचीत शुरू होगी, जो कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच मजबूत राजनीतिक इच्छा एवं आपसी विस्वास का परिचायक है।


भारत हमेशा से बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था का पक्षधर रहा है, मुद्दों पर आधारित द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय संबंधों को प्रमुखता देना समग्र कूटनीति का हिस्सा है| विश्व के सभी प्रमुख शक्ति के केंद्रों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों को स्थापित करने में मोदी नीति काफी सक्रिय रही है| अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार तथा उसके लोकतंत्रीकरण के मुद्दे को प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक मंचों पर लगातार उठाया है एवं इसे वैश्विक शांति के लिए आवश्यक बताया है|

कोविड के दौरान भी नई दिल्ली ने ना सिर्फ अपने ‘सभ्यतागत प्रतिबद्धताओं’ का निर्वाह करते हुए “वैक्सीन मैत्री” कार्यक्रम के अंतर्गत 95 देशों को वैक्सीन एवं अन्य चिकित्सीय सुविधा पहुंचाई बल्कि “वन्दे भारत मिशन” के तहत विदेशों में फंसे अपने 88 लाख प्रवासी नागरिकों की स्वदेश वापसी कराई| भारत में कोविड की दूसरी लहर ने चिकित्सीय व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी की परन्तु कोविड की पहली लहर के दौरान भारत द्वारा विश्व के कई देशों को की गयी सक्रिय मदद का यह परिणाम रहा की विश्व के कई देशों ने इस विपत्ति की घडी में भारत को चिकित्सीय उपकरण तथा वैक्सीन उपलब्ध कराई|


हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत ने बड़े भू-राजनैतिक परिवर्तन का पासा चला है| जापान अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत क्वाड या चार-पक्षीय सहयोग के आधार पर हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को “खुला एवं स्वतंत्र” रखने के लिए प्रतिबद्ध है| निकट भविष्य में सार्क एवं आसियान के कई अन्य देश के भी सम्मिलित होंगे जिससे यह समूह विश्व व्यवस्था को नए आयाम देगा| हालाँकि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद वहां शांति बनी रहे तथा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया एवं विकास के कार्यक्रम सतत चलते रहें यह नई दिल्ली का प्रयास होना चाहिए| विश्व के कई महत्वपूर्ण देश तालिबान के साथ वार्ता स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं ऐसे में भारत को भी सधे कूटनीतिक रास्तों को अपनाना होगा| प्रधानमंत्री मोदी को क्षेत्रीय शांति और संवाद के लिए कुछ नए प्रयोग करें होंगे|


प्रधानमंत्री मोदी ने विश्व के कई शक्ति केन्द्रों के साथ भारत के संबंधों का विस्तार किया जो गुटनिरपेक्षता से आगे की कूटनीति है| यह स्पष्ट रूप से भारतीय विदेश नीति में विविधता को दर्शाता है, इसे भारतीय विदेश नीति का ‘मोदी सिद्धांत’ कहा जाना चाहिए|



डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के अन्तराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं|


The views and opinions expressed in this article are those of the author and do not necessarily reflect the views of Ytharth.

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